इंद्रा एक्सप्रेस नेटवर्क
चौकियां धाम, जौनपुर। मां शीतला चौकियां धाम में चल रहे 5 दिवसीय श्रीराम कथा के चौथे दिन वाराणसी से पधारे कथा वाचक डा. मदन मोहन मिश्रा ने बताया कि काम को ब्रह्मचर्य से जीता जा सकता है किंतु मैं ब्रह्मचारी हूं का अहंकार खतरनाक है। लोग को दान से जीता जा सकता है लेकिन दानी होने का अहंकार अच्छा नहीं है। क्रोध को शांति से जीता जा सकता है किंतु मैं बहुत शांति प्रिया हूं। यह अहंकार अच्छा नहीं है। भक्ति को प्राप्त करने के लिये अहंकार का होना ठीक नहीं है। हम जब संसार की चिंता करते हैं तो चीता की ओर बढ़ते हैं। जब हम भगवत चिंतन करते हैं। भगवान की ओर बढ़ते हैं। रास्ते में चलते समय पैर के साथ आंख है। रास्ता ठीक से सम्पन्न होगा। आंख ज्ञानेंद्रिय है परंतु कर्मेंद्री है। हमारे जीवन में जो ज्ञान है, उसमें कर्म को उतरना ही श्रेष्ठ है। संसार में रहते हुये अपने को संसार से अलग रखकर देखना ही जैसे कमल जल में रहता है लेकिन जल से अलग रहता है। प्यार कारक है। सीता जी के सौंदर्य की चर्चा करते हुए उन्होंने कहा कि जो सुंदरता को भी सुंदर करें, शोभा के भवन में दीपक की तारा प्रकाशित हो, वही सीता है। काम क्रोध लोभ पर नियंत्रण ही मानव जीवन के लिए कल्याणकारी है।इसी क्रम में जौनपुर से पधारे डा. अखिलेश चन्द्र पाठक ने कथा प्रवचन के दौरान बताया कि सत्संग शब्द संस्कृत भाषा के दो शब्दों से मिलकर बना है ‘सत्’ जिसका अर्थ है सत्य, शुद्धता या परम परमेश्वर और ‘संग’ जिसका अर्थ है संगति, साथ या समूह शाब्दिक रूप से इसका अर्थ है सत्य की संगति या अच्छे और सच्चे विचारों के साथ रहना ही सत्संग है। ज्ञानी संतों, महापुरुषों या अच्छे विचारों वाले लोगों के साथ बैठना और उनके अनुभवों से जीवन की सच्चाइयाँ सीखना ही सत्संग है। कथा का संचालन गुड्डू उपाध्याय ने किया। इस अवसर पर राम आसरे साहू, त्रिभुवन नाथ त्रिपाठी, मनोज यादव, त्रिजुगी नाथ त्रिपाठी, मदन साहू, शिवासरे गिरी, हनुमान त्रिपाठी, अम्बिका गुप्ता सहित तमाम लोग मौजूद रहे।